Sunday, 27 March 2016

मुक्तकें


1.मैं उस धड़कन से जिन्दा हूँ,जो तुझपे रोज मरती है
    तुम्हारे  बिन  मेरी  रातें   ,शिकायत  रोज करती है
    ये आलम है  निकलने का   हमारी जान,बिछड़ने से
    वहां  तेरी  निकलती  है,  यहां  मेरी  निकलती  है

2.सभी ही  डूब  जाते हैं   मुहब्बत  की पनाहो में
   कभी तो एक ही चेहरा जले सबकी निगाहों में
   उतर कर चाँद आंगन में,मेरे घर में समाये पर
   दीवाने  रूठ   जाते है, कई  उसके  ही  राहों में

3 बुलती  है  ऊंचाई  पर  जमीं  न  छोड़ने  आया
   तेरे जैसा  कभी मुझको  नहीं मुंह मोड़ने आया
   ये करनी अपनी अपनी है दिलों के साथ करने की
   तूझे  ना  जोड़ने  आया  ,मुझे  ना  तोड़ने आया

4.खड़ा था मैं किनारे पर,फिसल के तूझ में आया हूँ
   समंदर  में जा  डूबा है,  हूनर  सुरज से पाया  हूँ
   तेरे दिल के ठिकाने से मिला   है जो,मुझे जितना
   उसे लेकर जमाने में  हर इक धड़कन पे छाया हूँ

5.जो आँखों को जलाती है सुहानी रात ही क्या है
   जो फूलों को भिगा न दे   भी  बरसात ही क्या है
   यूं समझो ना ये लड़कों को बेकारी में पड़े आशिक
  जो पीछे ये न भागे तो  तेरी औकात ही क्या है
                       ---यशपाल सजल---

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