Tuesday, 27 January 2015

गीत:चांदनी की हवा

सनसनाती हुयी चांदनी की हवा 
चूमती है उसे पर सताती मुझे 
उसकी हर लम्स से हाथ की नरमियां 
जिस्म के तार से सुर सुनाती मुझे 
             सनसनाती हुयी चांदनी की हवा ... 

बहती ठंढी हवा की वो पुरवाईयां
उसकी खुशबू से उसका  पता करती है 
झिलमिलाती हुयी रोशनी प्रीत पर 
प्रीत की सादगी को अता करती है 

शबनमी चांदनी में वो लथपथ कली 
हाथ थामे हुये सर झुकाती मुझे 
              सनसनाती हुयी चांदनी की हवा ... 

उस रुपहली चमक में मेरी शायरी 
लब को छूते हीं वो इक ग़ज़ल बन गयी 
सहमी सहमी हुयी उसकी कुछ कोशिशें 
शुष्क आंखें खुशी से सजल बन गयी 

जब भी सोयी ना वो रात थम सी गयी 
सुबह की लाली दुःख में जलाती मुझे

सनसनाती हुयी चांदनी की हवा 
चूमती है उसे  पर सताती मुझे 
उसकी हर लम्स से हाथ की नरमियां 
जिस्म के तार से सुर सुनाती मुझे
         -यशपाल सजल-