Monday, 2 March 2015

  मुक्तक:  शक हीं सही भरम में, मुझे तुझसे प्यार है 





1. एहसास उलझे दिल में  नित बेशुमार है
    तूझे जानता नही  पर     क्यों इंतज़ार है
    मुस्कान तेरे लब की मुझसे जो है गुजरी
    शक हीं सही भरम में मुझे तुझसे प्यार है

2. मेरे प्राण की सतह पर    तू है पिघल गयी
    समझौता हीं सही पर दिल को बदल गयी
    मेंहदी की पत्तियां  तब   झूमी जो प्रीत पर
    हाँथों पर वो मेंहदी किस्मत में ढल गयी

3. नाकाम दिल की  बस्ती      दरिया के पार है
    अधरों पे बूंद   शक की      तुझे इख़्तियार है
    तुम इश्क़ बनके उतरे       मुझको ये है गुरूर
    जिसे  ख़ुद की न ख़बर है ,तुझे उससे प्यार है

4. फ़ुरसत में ज़िन्दगी  है    जिन्दा  मकाम है
    हर शाम  ज़िन्दगी  से     रातों  के   नाम है
    ग़ैरत  में  मै  जिया  हूं     ग़ैरत  है  फैसला
     बिन मेरी तारीफों के , सजना हराम है

5. हम इश्क़ के  वो पंछी    संकोच में रहते
    इज़हार मैं ना करता     तुम भी नही करते
    मुद्दत है गुजरे उलझन में    मै कहूं या तुम
    मै भी तड़प के रहता   तुम भी नही कहते

6.होठों की मुस्कुराहट बस पी रहा हूँ मैं
   मेरा हाल पूछने को   आदी  रहा हूँ  मैं
   जिसे तुम समझ हो बैठे इक दोस्ती फ़कत
   उसे इश्क़ ही समझकर बस जी रहा हूँ मैं 

7.जो प्रीत बनके उलझी,सुलझी नही रब तक
   कस्तूरी सी  महक से  ढूढ़ू  तुझे  कब तक
   मुझमे तुम्हारी सांस का अधिकार यूं हुआ
   था सांस से परे पर   जीता रहा अब तक  



             -यशपाल सजल-

Sunday, 1 March 2015

गीत:क्यूं तरसाते कान्हा सबको क्यूं तड़पाते कान्हा सबको


कान्हा की बंसी     बंसीवट से   श्रंगार समीर  बहाये 
सुध की मारी चल पड़ी गोपियां धुन पर प्राण सजाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

उस मधुर पुष्प के  उपवन में    वायु धुन पर इतराती है 
मुरली की सुरमयी शरद रात इक प्रीत सुधा बरसाती है 
सखियों के भाग्य पृष्ठ से हो कर सखी श्रेष्ठ राधा उर तक 
लीला श्रेष्ठ  की   प्रीत  छवि    हर बाहों  में रंग चढ़ाती है 

छिटकी  पूनम  की  दुधियाई     तारों  संग  रास  रचाये 
सब पूछ रही खुद से सखियां क्या श्याम है मुझमे समाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

गिरधर के अधरों को छूकर बंसी खुद लय में झूम रही 
सृष्टि की हर मोहित दृष्टि ब्रज की बाहों में घूम रही 
मोहन की काया में घुलकर यमुना की लहरों से हो कर 
पूनम  की  ठंढी  मंद  हवा     बिन  पूछे मानो चूम रही 

राधा मोहन  के  प्रेम कुम्भ में     डूब के हीं सुख पाये 
मीरा मोहन की झलक बिना तो क्षण क्षण पलकें भिगाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

कान्हा  की  बंसी  बंसीवट से   श्रंगार समीर  बहाये 
सुध की मारी चल पड़ी गोपियां धुन पर प्राण सजाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

                            -यशपाल सजल-