Sunday, 1 March 2015

गीत:क्यूं तरसाते कान्हा सबको क्यूं तड़पाते कान्हा सबको


कान्हा की बंसी     बंसीवट से   श्रंगार समीर  बहाये 
सुध की मारी चल पड़ी गोपियां धुन पर प्राण सजाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

उस मधुर पुष्प के  उपवन में    वायु धुन पर इतराती है 
मुरली की सुरमयी शरद रात इक प्रीत सुधा बरसाती है 
सखियों के भाग्य पृष्ठ से हो कर सखी श्रेष्ठ राधा उर तक 
लीला श्रेष्ठ  की   प्रीत  छवि    हर बाहों  में रंग चढ़ाती है 

छिटकी  पूनम  की  दुधियाई     तारों  संग  रास  रचाये 
सब पूछ रही खुद से सखियां क्या श्याम है मुझमे समाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

गिरधर के अधरों को छूकर बंसी खुद लय में झूम रही 
सृष्टि की हर मोहित दृष्टि ब्रज की बाहों में घूम रही 
मोहन की काया में घुलकर यमुना की लहरों से हो कर 
पूनम  की  ठंढी  मंद  हवा     बिन  पूछे मानो चूम रही 

राधा मोहन  के  प्रेम कुम्भ में     डूब के हीं सुख पाये 
मीरा मोहन की झलक बिना तो क्षण क्षण पलकें भिगाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

कान्हा  की  बंसी  बंसीवट से   श्रंगार समीर  बहाये 
सुध की मारी चल पड़ी गोपियां धुन पर प्राण सजाये 
क्यूं तरसाते कान्हा सबको 
क्यूं तड़पाते कान्हा सबको 

                            -यशपाल सजल-

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