पंख कटे फिर भी उड़ना है ,ये कैसी जिन्दगानी है
जिदद से निकला था वो ऐसे ,कहता था कुछ हाथ लगे
जब नीचे देखा वो तब ,बस दूर -दूर सब पानी है
उड़ते जाना है मंजिल तक ,मन में उसने ठानी है
पंख झुलस जाते गरमी में ,फिर भी हार न मानी है
बादल से पंछी ने बोला ,कुछ तो कर मुझपर एहसान
बादल गरजे बिन पानी ,कहता ख़त्म सब पानी है
जा कर वो उस डाल पे बैठा ,जिसकी ख़त्म कहानी है
पते कुछ टहनी से बिछड़ गये ,रह गयी कुछ की निशानी है
उस डाली से उस पंछी ने,पूछा है ये फ़साना क्या
हम किस्मत के मारों को ,इक साथ ये रात बितानी है
ये कैसी उस शज़र की दुविधा ,उल्फ़त-ए -रस्म निभानी है
उस पंछी के जीवन और आंधी की लाज़ बचानी है
अोलें पड़ते सर्द रात ,पूछा उल्फ़त का वो आलम
रहकर भी गर्दिश -ए -तूफां मे ,कहता फर्ज़ निभानी है
-यशपाल सजल -

Gr88 bhai...keep it up..
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